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आदि पर्व
अध्याय ९२
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वैशम्पाय़न उवाच
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे |  ३१   क
या वा त्वं सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति