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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
कालवर्षी च पर्जन्यो धर्मचारी च पार्थिवः |  १   क
सम्पद्यदैषा भवति सा विभर्ति सुखं प्रजाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति