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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
न हि दुर्वलदग्धस्य कुले किञ्चित्प्ररोहति |  १५   क
आमूलं निर्दहत्येव मा स्म दुर्वलमासदः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति