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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
नूनं नाश्रद्दधद्वाक्यमेष मे पुरुषर्षभः |  १०३   क
स त्वं गोविन्दवाक्यानि मानय़स्व जय़ैषिणः ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति