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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति; संस्कारं वा राजगुणं व्रुवाणाः |  २६   क
तैरेवाधर्मश्चरितो धर्ममोहा; त्तूर्णं जह्यात्सुकृतं दुष्कृतं च ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति