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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
संविभज्य यदा भुङ्क्ते न चान्यानवमन्यते |  ३०   क
निहन्ति वलिनं दृप्तं स राज्ञो धर्म उच्यते ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति