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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु व्यपमार्ष्टि वै |  ३४   क
हर्षं सञ्जनय़न्नॄणां स राज्ञो धर्म उच्यते ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति