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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा |  ४३   क
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति