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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
ततस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै परम् |  ४७   क
स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनश्यति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति