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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
धर्मश्चार्थश्च कामश्च धर्म एवोत्तरो भवेत् |  ४८   क
अस्मिँल्लोके परे चैव धर्मवित्सुखमेधते ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति