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अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
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अग्निरु उवाच
निवप्ते चाग्निपूर्वे वै निवापे पुरुषर्षभ |  १२   क
न व्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षय़न्त्युत |  १२   ख
रक्षांसि चापवर्तन्ते स्थिते देवे विभावसौ ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति