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अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
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अग्निरु उवाच
रजस्वला च या नारी व्यङ्गिता कर्णय़ोश्च या |  १५   क
निवापे नोपतिष्ठेत सङ्ग्राह्या नान्यवंशजाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति