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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
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जनमेजय़ उवाच
पितामहस्य मे यज्ञे धर्मपुत्रस्य धीमतः |  १   क
यदाश्चर्यमभूत्किञ्चित्तद्भवान्वक्तुमर्हति ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति