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वन पर्व
अध्याय २४०
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दानवा ऊचुः
प्रहरिष्यन्ति वन्धुभ्यः स्नेहमुत्सृज्य दूरतः |  १४   क
हृष्टाः पुरुषशार्दूलाः कलुषीकृतमानसाः |  १४   ख
अविज्ञानविमूढाश्च दैवाच्च विधिनिर्मितात् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति