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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रद्धेय़वाक्यः प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं विभर्षि च |  १७   क
समागतश्च विप्रैस्त्वं तत्त्वतो वक्तुमर्हसि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति