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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
वहु मन्ये च ते वुद्धिं भृशं सम्पूजय़ामि च |  ४३   क
येनाहं भवता वुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति