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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुभूतं च दृष्टं च यन्मय़ाद्भुतमुत्तमम् |  २१   क
उञ्छवृत्तेर्यथावृत्तं कुरुक्षेत्रनिवासिनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति