वन पर्व  अध्याय २०५

व्राह्मण उवाच

मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात्तव |  १८   क
नाकृतात्मा वेदय़ति धर्माधर्मविनिश्चय़म् ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति