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आदि पर्व
अध्याय ७४
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शुक्र उवाच
यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमय़ेह निरस्यति |  ४   क
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति