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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
स भित्त्वा तु शरो राजन्पाञ्चाल्यं कुलनन्दनम् |  ३४   क
अभ्यगाद्धरणीं तूर्णं लोहितार्द्रो ज्वलन्निव ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति