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वन पर्व
अध्याय १९८
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मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ानः स धर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाव्रवीत् |  २   क
श्रद्दधानेन भाव्यं वै गच्छामि मिथिलामहम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति