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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
कदम्वतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि |  २४   क
दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति