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भीष्म पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
यथा वा पशुमध्यस्थो द्रावय़ेत पशून्वृकः |  ३४   क
वृकोदरस्तव सुतांस्तथा व्यद्रावय़द्रणे ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति