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वन पर्व
अध्याय ६३
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वृहदश्व उवाच
स तेऽक्षहृदय़ं दाता राजाश्वहृदय़ेन वै |  २०   क
इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान्मित्रं चैव भविष्यति ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति