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भीष्म पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
विप्रविद्धैः कलापैश्च पतितैश्च शरासनैः |  ६२   क
विप्रकीर्णैः शरैश्चापि रुक्मपुङ्खैः समन्ततः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति