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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
माधवस्तु रणे राजन्कुरुराजस्य धन्विनः |  १४   क
धनुश्चिच्छेद सहसा क्षुरप्रेण हसन्निव |  १४   ख
अथैनं छिन्नधन्वानं शरैर्वहुभिराचिनोत् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति