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वन पर्व
अध्याय २९४
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जनमेजय़ उवाच
क्वस्था वीराः पाण्डवास्ते वभूवुः; कुतश्चैतच्छ्रुतवन्तः प्रिय़ं ते |  ४१   क
किं वाकार्षुर्द्वादशेऽव्दे व्यतीते; तन्मे सर्वं भगवान्व्याकरोतु ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति