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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खं विशिखं समाधाय़ स सात्यकिः |  ३७   क
व्यसृजत्तं महाज्वालं सङ्क्रुद्धमिव पन्नगम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति