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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
सोऽविशत्कृतवर्माणं यमदण्डोपमः शरः |  ३८   क
जाम्वूनदविचित्रं च वर्म निर्भिद्य भानुमत् |  ३८   ख
अभ्यगाद्धरणीमुग्रो रुधिरेण समुक्षितः ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति