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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
सहस्रवाहोः सदृशमक्षोभ्यमिव सागरम् |  ४१   क
निवार्य कृतवर्माणं सात्यकिः प्रय़यौ ततः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति