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द्रोण पर्व
अध्याय ९२
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सञ्जय़ उवाच
समाश्वास्य च हार्दिक्यो गृह्य चान्यन्महद्धनुः |  ४४   क
तस्थौ तत्रैव वलवान्वारय़न्युधि पाण्डवान् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति