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वन पर्व
अध्याय १९३
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उत्तङ्क उवाच
निरुद्विग्नस्तपश्चर्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव |  १४   क
ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति