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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृपाः |  ३४   क
अनुज्ञातास्तय़ा सर्वे न्यवर्तन्त जनाधिपाः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति