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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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धृतराष्ट्र उवाच
कथं शिखण्डी गाङ्गेय़मभ्यवर्तत संय़ुगे |  १   क
पाण्डवाश्च तथा भीष्मं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति