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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
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श्वशुर उवाच
रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिञ्चनः |  ७२   क
शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति