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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
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श्वशुर उवाच
पावितो हि त्वय़ा देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते |  ८१   क
सभार्यः सहपुत्रश्च सस्नुषश्च दिवं व्रज ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति