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वन पर्व
अध्याय ९३
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वैशम्पाय़न उवाच
गय़स्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः |  २४   क
यत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति