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मौसल पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेय़ं राहुणा पुनः |  १७   क
तदा च भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षय़ाय़ नः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति