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उद्योग पर्व
अध्याय ९३
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वैशम्पाय़न उवाच
शक्यं किमन्यद्वक्तुं ते दानादन्यज्जनेश्वर |  ५१   क
व्रुवन्तु वा महीपालाः सभाय़ां ये समासते |  ५१   ख
धर्मार्थौ सम्प्रधार्यैव यदि सत्यं व्रवीम्यहम् ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति