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उद्योग पर्व
अध्याय ९३
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वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रुं जानीषे स्थितं धर्मे सतां सदा |  ५४   क
सपुत्रे त्वय़ि वृत्तिं च वर्तते यां नराधिप ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति