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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तपसा चातितीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति |  ५०   क
मत्प्रसादात्प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति