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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
गदाश्च शैक्याः परिघाश्च शुभ्रा; रथेषु शक्त्यश्च विवर्तमानाः |  १८   क
प्रतिप्रभा रश्मिभिराजमीढ; पुनः पुनः सञ्जनय़न्ति दीप्ताः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति