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द्रोण पर्व
अध्याय ९३
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिस्तु ततो द्रोणं नवभिर्नतपर्वभिः |  १२   क
आजघान भृशं क्रुद्धो ध्वजं च निशितैः शरैः |  १२   ख
सारथिं च शतेनैव भारद्वाजस्य पश्यतः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति