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द्रोण पर्व
अध्याय ९३
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सञ्जय़ उवाच
लाघवं युय़ुधानस्य दृष्ट्वा द्रोणो महारथः |  १३   क
सप्तत्या सात्यकिं विद्ध्वा तुरगांश्च त्रिभिस्त्रिभिः |  १३   ख
ध्वजमेकेन विव्याध माधवस्य रथे स्थितम् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति