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द्रोण पर्व
अध्याय ९३
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि समरे राजन्माधवस्य महद्धनुः |  २२   क
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद रथशक्त्या च सारथिम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति