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द्रोण पर्व
अध्याय ९३
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सञ्जय़ उवाच
ततः शरशतेनैव युय़ुधानो महारथः |  २५   क
अविध्यद्व्राह्मणं सङ्ख्ये हृष्टरूपो विशां पते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति