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द्रोण पर्व
अध्याय ९३
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सञ्जय़ उवाच
तैर्ललाटार्पितैर्वाणैर्युय़ुधानस्त्वजिह्मगैः |  ४   क
व्यरोचत महाराज त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति