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आदि पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्कुरुपतिश्रेष्ठे राजराजेश्वरे सति |  १७   क
श्रिता वागभवत्सत्यं दानधर्माश्रितं मनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति