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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
ते समासाद्य समरे परस्परमरिन्दमाः |  ३८   क
विव्यधुश्चैव जघ्नुश्च समासाद्य महाहवे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति