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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्महावाहुर्वासुदेवो धनञ्जय़म् |  ५१   क
एष प्रय़ाति त्वरितो क्रोधाविष्टो युधिष्ठिरः |  ५१   ख
जिघांसुः सूतपुत्रस्य तस्योपेक्षा न युज्यते ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति